भीड़तंञ

सोच-सोच ऊन बातों को,आज मैं डरता हूँ

हर कदम बढ़ाने से पहले,पीछे मुड़कर देखता हूँ

चंद लोगों की भीड़ देख,मन सिहर सा जाता है

आखिर मृत्यु का यह भय

असल समय से पहले क्यों आता है?

माँसभक्षी कुछ इंसान,आज नरभक्षी बना है
रंग-बिरंगे कपड़े उसके,आज खून में सना है

भीड़-तंञ का हर व्यक्ति,गौरववान बन तना है

अधमरे को समझाता है की गौमांस खाना मना है
है भगवा गमक्षा ओढे़ या पहने जालीदार टोपी
उस पति या पिता की किसी ने एक न सुनी

इन धर्म के ठेकेदारों को,खून भी पानी लगने लगी

“आज सड़को पर इंसान नहीं

इंसानियत दम तोड़ने लगी”

धर्म की आग में झुलस रहा मेरा देश है
“गौ को काट”विरोध करने वालों को एक संदेश है

धर्म-निरपेक्षता की चादर ओढे़

आखिर गौ से तुम्हारा यह कैसा द्वेष है?

जिस गाय के नाम पर सत्ता के लिए हाथ जोड़ा
आज “बुध्दिजीवि” बन उसी गाय की गरदन को मरोड़ा

करोड़ों की भावनाओं को है जोरदार तमाचा जडा़

उम्मिद है वह दिन भी तू जरूर लाएगा

सत्ता की लालच में

अपनी माँ को ही जलाएगा

काली सड़कों पर अब लाल रंग चढ़ा है
न जाने गौ और इंसानों की साजिश को किसने रचा है

शायद ही इस भीड़ में इंसान कोई बचा है

लाशों का ढेर बनाने में,न जाने यह कैसा मजा है

चारों ओर मतभेद का फैला काला धुआँ है

आज तो डर से आसमां भी बादल में छुपा है

निशाचर रूपी सन्नाटा ही सन्नाटा छाया है

न राम की,न रहीम की

न किसी की यह सुन रहा है

आखिर इस देश को ये क्या हुआ है?

आखिर इस देश को ये क्या हुआ है?

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17 thoughts on “भीड़तंञ

  1. न राम की,न रहीम की

    न किसी की यह सुन रहा है

    आखिर इस देश को ये क्या हुआ है?

    बहुत खूब👌👌👌

    Liked by 1 person

  2. Woahh! The best thing about the poetry is you made us count countless problems of our country in countable lines. This was a very difficult thing to do. And you, being you, did it outstandingly.
    I had goosebumps while reading this. Yet again a fabulous work. More than just a writer, you are an artist. 😊

    Liked by 1 person

    1. Thanks a lot shayra.Actually I was not satisfied with it and to be true I am not presently even.But I thought I wont get enough time in these 2 days so wanted to post it.But I am so glad you loved it.If there is any flaw or mistake definitely bring it to my concern

      Like

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