राजनीति-एक व्यंगय

अदभुत है ये देश हमारा,
विश्वगुरू बनने की ओर,

सबसे बड़ा लोकतंञ हमारा,

विभिन्न रंगों से है सजा-धजा,

हिन्दु,मुस्लिम,सिख,ईसाइ है इसकी चार भुजा।

संविधान ने रची एक ऐसी गाथा,

राजा-प्रजा का भेद हमें सिखाता,

चुनावी महीनों में कुर्सी का इच्छु,

हाथ जोड़ घर-घर बन जाता भिच्छु।

चुनावी रैलियों में सुनने इनका भाषण,

जनता लिए बैठे अपना आशन,

कोई कहता आएगा सुशासन,कोई कहता मिटेगा कुपोषण,

जनता के पैसों से करते खुद का ही पालन-पोषण।
कोई आम आदमी का मुखौटा लगाए,

वोटों के पीछे पड़ता,

आम आदमी ही माला पहना

है इनको थप्पड़ जड़ता।

छप्पन इंच का सीना बता,लोगों में भरते ये जोश,

इनके इक फैसले ने उड़ा दिए जनता के होश,

देश बदलने की बातें कर,मांगा इनने वोट,

किसे पता था बेकार हो जाएगें जेब में रखे ये नोट,

गंगाजी में डालने को न था एक रूपईया,

आज बोरी के बोरी कहाँ से आए भईया।

कुछ हाथ उठा-उठा करते बडी़-बड़ी बातें,

खुद की असिम ञुटियों को डाले दूसरों के माथे,

जब इनके हाथों में थी सत्ता की कमान,

भरे संसद में किया देश का अपमान।

गजब है इस देश की राजनीति,

बंद कमरों में तय होती इनकी रण्नीति,

जनता को बेवकूफ बनाने की है इनने ठानी,

दशकों बीत गए पर नहीं बदली कोई कहानी।

राजनेताओं की मिली-जुली है कारस्तानी,

जाती,धर्म,प्रांत के नाम पर ये पहुचें “राजधानी”,

एक ही सवाल मन को टोके,

कैसे इनके,स्वार्थी मन को रोकें,

क्योंकी हर रोज इनकी वजह से लाखों हैं भूखे सोते।।।

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s