क्यों-एक सवाल

 
सूरज की चमकती किरणों से भी तेज उसकी अाँखें,

अासमाँ में उड़ रहे परिदों से भी ऊचें उसके इरादे,

सुबह घर से निकलते,मुस्कुराते,

क्यों  उसके  जाते सभी के चेहरों पर डर के बादल छाते।


दिन की तेज रौशनी हो या अंधेरी रातें,

क्यों उसके हृदय को कुछ डर सताते,

उसके पीछे,कुछ,क्यों करते बेकार सी बातें,

आखिर कौन से डर उसके मन को सताते।

जब अंधेरी,सकरी गलियों से,वह घर को वापस आती,

क्यों एक- एक कदमों की आहट से वह है घबराती,

दूर खड़े कुछ लोगों की निगाहों से बचने को,

क्यों  मजबूर है वो अपना रास्ता बदलने को।


सरपट कदमों से वह घर की ओर भागती,

घर के दरवाजों पर,उसकी जान में जान आती,

घरवालों को गले लगाकर मन ही मन रोती,

और बस एक सवाल खुद से है पूछती,


क्या लड़की होना ही,है मेरी गलती।।।

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10 thoughts on “क्यों-एक सवाल

  1. You should not be! What you do is a major contribution to change.Your poem reflected the purity of your soul and your respect towards women. And when individuals contribute a major change is witnessed. I am so happy that you wrote this. It is now one of my favourite poems.☺

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